वन परिक्षेत्र कुंवारपुर रेंज से अवैध लकड़ी तस्करी मामले में एक और बड़ा खुलासा…..एक ही खसरा नंबर, दो अलग-अलग रिकॉर्ड… क्या जिले में बैठे जिम्मेदार अधिकारियों के संरक्षण में चल रहा है अवैध लकड़ी तस्करी का खेल?


एक ही खसरा नंबर, दो अलग-अलग रिकॉर्ड… क्या जिले में बैठे जिम्मेदार अधिकारियों के संरक्षण में चल रहा है अवैध लकड़ी तस्करी का खेल?

कुंवारपुर/मनेंद्रगढ़

भखार न्यूज नेटवर्क: एमसीबी जिले के कुंवारपुर वन परिक्षेत्र में नीलगिरी (यूकेलिप्टिस) की लकड़ी से भरे ट्रक के मामले ने अब नया मोड़ ले लिया है। पूरे प्रकरण में एक ही खसरा नंबर से जुड़े दो अलग-अलग रिकॉर्ड सामने आने के बाद  वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

जानकारी के अनुसार, 20 जून को कुंवारपुर वन परिक्षेत्र से परिवहन करते बिना वैध दस्तावेजों के पकड़े गए नीलगिरी की लकड़ी से भरे ट्रक को प्रारंभिक जांच में कथित तौर पर अवैध परिवहन का मामला माना गया था। लेकिन बाद में आखिर किस आधार पर ट्रक को छोड़ दिया गया, इसे लेकर अब तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है।

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बताया जा रहा है कि ट्रक चालक के पास न तो वैध दस्तावेज थे, न ही दूसरे राज्य में लकड़ी परिवहन के लिए टीपी (ट्रांजिट परमिट) था और न ही वन विभाग का सत्यापन। इसके बावजूद ट्रक को कुछ समय तक दिखावे के लिए खड़ा रखने के बाद कथित तौर पर रातों-रात छोड़ दिया गया।

वहीं, ट्रक चालक द्वारा एक पंचायत का सत्यापन पत्र तथा फॉर्म-पी की खसरा क्रमांक वाली फोटो कॉपी प्रस्तुत की गई। फॉर्म-पी की फोटो कॉपी में संबंधित खसरा नंबर पर नीलगिरी (यूकेलिप्टिस) की फसल दर्ज दिखाई गई है।

साथ ही फोटो कॉपी में कथित तौर पर ओवर करेक्शन (सुधार) कर “नीलगिरी (यूकेलिप्टिस) 100” लिखा हुआ भी नजर आ रहा है

जबकि उसी खसरा नंबर का ऑनलाइन रिकॉर्ड देखने पर कथित रूप से “निरंक” दर्ज दिखाई दे रहा है।

यदि ऐसा है, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक ही खसरा नंबर के दो अलग-अलग रिकॉर्ड आखिर कैसे मौजूद हैं?

इतना ही नहीं, यदि दस्तावेजों में विसंगति थी तो संबंधित ट्रक को किस नियम और किस आधार पर छोड़ा गया? क्या दस्तावेजों का विधिवत सत्यापन किया गया था, या फिर पूरे मामले में कहीं न कहीं लापरवाही अथवा किसी प्रकार की मिलीभगत हुई?

 

अब इस पूरे मामले में कई अहम सवाल जवाब मांग रहे हैं—

  • एक ही खसरा नंबर के दो अलग-अलग रिकॉर्ड कैसे?
  • फॉर्म-पी और ऑनलाइन रिकॉर्ड में अंतर क्यों?
  • ट्रक को छोड़ने का आधार क्या था?

 

 

क्या पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी?

हालांकि, इन सवालों पर अब तक वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। ऐसे में पूरे मामले की पारदर्शी जांच कर तथ्यों को सार्वजनिक किए जाने की मांग तेज होती जा रही है

 

वहीं, सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कथित तौर पर कुंवारपुर वन परिक्षेत्र में पदस्थ एक डिप्टी रेंजर को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं हैं। आरोप हैं कि उनके संरक्षण में संरक्षित जंगलों से अवैध उत्खनन और अवैध लकड़ी तस्करी करने वालों के हौसले बुलंद हो रहे हैं।

 

सूत्रों का यह भी दावा है कि संबंधित अधिकारी जहां-जहां पदस्थ रहे, वहां वे विवादों में रहे और उनके खिलाफ पहले भी कार्रवाई एवं निलंबन की चर्चाएं होती रही हैं। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।

 

यह भी कहा जा रहा है कि संरक्षित जंगलों से कथित अवैध रेत उत्खनन के मामलों में भी उनका नाम सामने आ चुका है। यदि ऐसा है, तो सवाल उठता है कि इसके बावजूद जिले में बैठे जिम्मेदार अधिकारी ऐसे कर्मचारियों पर आखिर क्यों मेहरबान हैं?

 

अब उठ रहे हैं बड़े सवाल—

  • क्या जिले में बैठे जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत से ही अवैध लकड़ी तस्करी का खेल चल रहा है?
  • आए दिन अवैध लकड़ी तस्करी और संरक्षित जंगलों से अवैध उत्खनन के मामले सामने आने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी केवल अनदेखी क्यों कर रहे हैं?
  • क्या जिम्मेदार अधिकारियों की अनदेखी से ही ऐसे कर्मचारियों और तस्करों के हौसले बुलंद हो रहे हैं?
  • क्या जिले में बैठे जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए?

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