केंद्र के नाम पर नियमों का कत्ल, अवैध रेत खनन, पेड़ों की कटाई और मजदूरों के शोषण के गंभीर आरोप
सोनहत / कोरिया
भखार न्यूज नेटवर्क: आदिवासी अंचल के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए बनाए जा रहे एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय का निर्माण इन दिनों गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है। करोड़ों रुपये की लागत से बन रहे इस प्रोजेक्ट में गुणवत्ता, पर्यावरण और श्रम कानूनों की खुलेआम अनदेखी के आरोप सामने आ रहे हैं।
स्थानीय लोगों और सूत्रों का दावा है कि निर्माण कार्य में घटिया सामग्री का उपयोग, अवैध रेत उत्खनन, पेड़ों की कटाई और मजदूरों के शोषण जैसे कई गंभीर अनियमितताएँ हो रही हैं।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह पूरा काम केंद्र सरकार की एजेंसी के नाम पर किया जा रहा है और स्थानीय प्रशासन को कथित तौर पर हस्तक्षेप से रोका जा रहा है।
“केंद्र का प्रोजेक्ट है” कहकर नियमों को दिखाया जा रहा ठेंगा
निर्माण स्थल पर मौजूद इंजीनियरों का कथित तौर पर कहना है कि
“यह केंद्र सरकार का प्रोजेक्ट है, इसमें राज्य सरकार के अधिकारी हस्तक्षेप नहीं कर सकते।”
इस बयान ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं —
- आखिर इस प्रोजेक्ट का टेंडर किस विभाग ने जारी किया?
- निर्माण किस एजेंसी द्वारा कराया जा रहा है?
- क्या केंद्र का प्रोजेक्ट होने का मतलब नियम-कानून से ऊपर होना है?
स्थानीय लोगों का कहना है कि इसी दलील की आड़ में ठेकेदार और इंजीनियर बेलगाम तरीके से काम कर रहे हैं।
घटिया सामग्री से निर्माण का आरोप

ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण कार्य में मानकों का पूरी तरह उल्लंघन किया जा रहा है।
बताया जा रहा है कि
- सीमेंट के मसाले में शुद्ध रेत की जगह मिट्टी मिली रेत का उपयोग हो रहा है
- सीमेंट की मात्रा भी निर्धारित मानकों से कम बताई जा रही है
करोड़ों की लागत से बन रहे भवन में यदि इसी तरह घटिया निर्माण हुआ तो भविष्य में छात्रों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
पर्यावरण को भारी नुकसान, साल के पेड़ काटे गए

विद्यालय परिसर और आसपास के क्षेत्र में कई पुराने साल और अन्य पेड़ों को मशीनों से काटे जाने की जानकारी सामने आई है।

ग्रामीणों का दावा है कि
- पेड़ों की कटाई की अनुमति स्पष्ट नहीं है
- काटे गए पेड़ों की कीमती लकड़ियां भी गायब हैं
नियमों के अनुसार सरकारी जमीन पर कटे पेड़ों की लकड़ी वन विभाग के डिपो में जमा होना चाहिए, लेकिन यहाँ ऐसा नहीं हुआ।
इससे यह सवाल उठता है कि क्या लकड़ियों की अवैध तरीके से बिक्री कर दी गई?
मजदूरों के साथ भेदभाव का आरोप
निर्माण स्थल पर काम कर रहे मजदूरों के साथ भी अन्याय की शिकायतें सामने आई हैं।
सूत्रों के अनुसार
- पुरुष मजदूरों को अधिक मजदूरी दी जा रही है
- महिलाओं को उसी काम के लिए कम भुगतान किया जा रहा है
जबकि महिलाएं भी सुबह से शाम तक ईंट ढोने और मसाला बनाने जैसे कठिन कार्य कर रही हैं।
यह सीधे तौर पर श्रम कानूनों का उल्लंघन माना जा रहा है।
अवैध रेत उत्खनन का भी आरोप

स्थानीय सूत्रों के मुताबिक निर्माण में उपयोग की जा रही रेत का बड़ा हिस्सा नदी-नालों से अवैध रूप से निकाला जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि ट्रैक्टरों से दिन-रात रेत निकाली जा रही है रॉयल्टी पर्ची का कोई रिकॉर्ड नहीं है
भारी मात्रा में रेत का बिना अनुमति भंडारण किया गया है
यदि यह सही है तो इससे शासन के राजस्व को भारी नुकसान हो रहा है। प्रशासन की चुप्पी पर उठ रहे सवाल
पूरे मामले में स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है।
विशेषज्ञों का कहना है कि चाहे प्रोजेक्ट केंद्र का हो या राज्य का, भूमि, खनिज और कानून व्यवस्था राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
ऐसे में अवैध खनन पर्यावरण क्षति श्रम कानून उल्लंघन जैसे मामलों में स्थानीय प्रशासन कार्रवाई कर सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल
अब क्षेत्र में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि —
- क्या इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी?
- क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी?
- या फिर यह भी एक और सरकारी प्रोजेक्ट की तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाएगा?
फिलहाल स्थानीय लोग और जनप्रतिनिधि इस मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग कर रहे हैं।