एमसीबी/छत्तीसगढ़
कुंवारपुर वन परिक्षेत्र में पौधारोपण पर बड़ा सवाल,एक तरफ ग्रामीणों को निस्तार की अनुमति, तो दूसरी ओर कुछ ग्रामीणों को निस्तार से वंचित करने का आरोप वहीं ₹6,000 लेकर ₹5,000 की दी गई रसीद,सामने आई मनी रसीद में ₹5,000 दर्ज
भखार न्यूज नेटवर्क: एमसीबी जिले का कुंवारपुर वन परिक्षेत्र एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार मामला सिर्फ निस्तार या ₹6,000 लेकर ₹5,000 की रसीद देने के सवाल तक सीमित नहीं है। कुंवारपुर वन परिक्षेत्र में जुड़े इससे पहले से चल रहे कई मामलों को जोड़कर देखें तो कथित रेत उत्खनन से लेकर लकड़ी से भरे ट्रक, जंगल की जमीन दिलाने के नाम पर महिला से ₹17 हजार लेने के आरोप, पत्रकारों पर पैसे मांगने के आरोप और अब निस्तार के नाम पर कथित दोहरे मापदंड व रसीद का विवाद—एक के बाद एक कई सवाल सामने आ चुके हैं।

सबसे बड़ा सवाल यही है—
आखिर हर बार कुंवारपुर वन परिक्षेत्र ही सवालों के घेरे में क्यों?
और अब, जब इस पूरे मामले में लगातार शिकायतें, खबरें, वीडियो और आरोप सामने आ चुके हैं, तो लोगों की नजरें नए जिम्मेदार अधिकारी पर हैं।
क्या इस बार पुराने और नए सभी मामलों को एक साथ लेकर निष्पक्ष जांच होगी?
पहला मामला—संरक्षित जंगल में कथित रेत उत्खनन
कुंवारपुर वन परिक्षेत्र में कथित अवैध रेत उत्खनन का मामला सामने आया था। वीडियो में ट्रैक्टर के माध्यम से रेत निकालते हुए दृश्य दिखाई देने के साथ मामले में एक ट्रैक्टर मालिक का कथित बयान भी सामने आया, जिसमें संबंधित डिप्टी का नाम लेते हुए सुबह रेत निकालने और दिन में वाहन नहीं चलाने की बात कहे जाने का दावा किया गया। जब मीडिया ने संबंधित डिप्टी से इस मामले में जानकारी लेने की कोशिश की तो डिप्टी का कहना था कि उत्खनन नहीं हो रहा पत्रकार और पत्रकारों के वीडियो फोटो का कोई महत्व नहीं है जिसकी ऑडियो भी मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक की गई
यहीं से सवाल और बड़ा हो गया—
अगर रेत उत्खनन नहीं हो रहा था तो वीडियो में दिखाई दे रही गतिविधि आखिर क्या थी? और इस दौरान जब मीडिया खबर को कवरेज कर रहा था तो ट्रैक्टर मालिक द्वारा स्वयं बताया गया कि संबंधित डिप्टी ने कहा है कि सुबह निकल लेना दिन में मत चलना और यदि वीडियो गलत था तो उसकी जांच कराकर सच्चाई सामने क्यों नहीं लाई गई?
दूसरा मामला—नीलगिरी से भरा ट्रक और दस्तावेजों का सवाल
20 जून 2026 को कुंवारपुर वन परिक्षेत्र से परिवहन करते एक नीलगिरी की लकड़ी से भरा एक ट्रक पकड़ा गया उस समय संबंधित डिप्टी अधिकारी ने मीडिया कैमरे के सामने कथित तौर पर कहा था कि दस्तावेजों के आधार पर वाहन “अभी तक तो अवैध है”, क्योंकि चालक के पास आवश्यक सत्यापन और वैध दस्तावेज उपलब्ध और अन्य राज्य में परिवहन करने के लिए कोई वैद्य दस्तावेज नहीं थे।
इसके बाद ट्रक चालक द्वारा खसरे की फोटोकॉपी दिखाई गई जिसमें फसल का नाम यूकेलिप्टस दर्ज दिखाई दे रहा, जबकि उसी खसरा नंबर के ऑनलाइन रिकॉर्ड में फसल का नाम “निरंक” दिखाई दिया। तो विभाग द्वारा इसकी जांच किस स्तर पर हुई? जब शुरुआत में वाहन को संबंधित डिप्टी द्वारा अवैध बताया गया तो बाद में उसे किस आधार पर छोड़ा गया?
तीसरा मामला—जंगल की जमीन दिलाने के नाम पर ₹17 हजार का आरोप
इसके बाद एक महिला सामने आई और उसने आरोप लगाया कि जंगल की जमीन दिलाने के नाम पर उससे ₹17 हजार लिए गए? यदि आरोप सही है तो जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।और यदि आरोप गलत है तो शिकायत की सत्यता सामने आनी चाहिए तथा गलत आरोप लगाने वाले के खिलाफ भी नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन इन सभी मामलों की न जांच हुई न कुछ उसके बाद मामलों बिना जांच के संबंधित डिप्टी ने खबरो को झूठे और भ्रामक बताया साथ ही लगातार प्रकाशित खबरो से तिलमिलाए डिप्टी ने पत्रकारों पर पैसे मांगने जैसे गंभीर आरोप लगाए जाने की बात भी सामने आई।
अब यहां भी सवाल सीधा है—
- यदि खबरें झूठी हैं तो जांच कराकर यह साबित क्यों नहीं किया जाता?
- और यदि पत्रकारों पर पैसे मांगने का आरोप लगाया गया है तो—
- पत्रकार कौन था? कितने पैसे मांगे गए? कब मांगे गए? क्या बातचीत की रिकॉर्डिंग, मैसेज या कोई अन्य प्रमाण मौजूद है?
- यदि प्रमाण हैं तो उन्हें जांच एजेंसी के सामने रखा जाना चाहिए।
- और यदि आरोप निराधार हैं तो इसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
अब नया मामला—निस्तार में कथित दोहरे मापदंड और ₹6,000 लिए जाने और ₹5,000 की रसीद दिए जाने को लेकर है।
पुराने विवाद अभी शांत भी नहीं हुए थे कि ग्राम जरडोल-पतवाही से निस्तार को लेकर नया मामला सामने आ गया।
ग्रामीणों का आरोप है कि एक ओर कुछ लोगों को निस्तार की अनुमति दी गई, जबकि दूसरी ओर कुछ ग्रामीणों को इससे वंचित किया गया। कुछ ग्रामीणों ने तो यहां तक दावा किया है कि निस्तार के नाम पर जंगल की जमीन तक छोड़ी गई साथ ही ₹6 हजार लिए तो ₹5 हजार की रसीद क्यों?
नए मामले में सबसे बड़ा सवाल कथित रूप से ₹6,000 लिए जाने और ₹5,000 की रसीद दिए जाने को लेकर है।
- एक ग्रामीण का आरोप है कि उससे ₹6,000 लिए गए, लेकिन सामने आई मनी रसीद में ₹5,000 दर्ज हैं।
- अब ग्रामीण पूछ रहा है— ₹1,000 का हिसाब कहां है?
- अगर ₹6,000 लिए गए थे तो ₹6,000 की रसीद क्यों नहीं?
अब सवाल सिर्फ डिप्टी का नहीं, पूरे सिस्टम का है
कुंवारपुर वन परिक्षेत्र से जुड़े मामलों में लगातार अलग-अलग आरोप सामने आए।
- रेत का मामला।
- लकड़ी परिवहन पर सवाल
- जंगल की जमीन के नाम पर ₹17 हजार का आरोप।
- पत्रकारों पर पैसे मांगने के आरोप।
- खबरों को झूठा और भ्रामक बताए जाने का विवाद।
- और अब निस्तार तथा ₹6 हजार बनाम ₹5 हजार की रसीद का सवाल।
क्या यह महज संयोग है कि बार-बार इसी वन परिक्षेत्र से सवाल उठ रहे हैं? या फिर कहीं न कहीं व्यवस्था में ऐसी खामियां हैं जिनकी गहराई से जांच जरूरी है?
10 दिन का अल्टीमेटम भी दिया जा चुका है
इन मामलों को लेकर सद्भाव पत्रकार संघ छत्तीसगढ़ द्वारा 10 अगस्त 2026 को राज्यपाल के नाम कलेक्टर, एमसीबी के माध्यम से शिकायत आवेदन सौंपकर उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग की जा चुकी है।
शिकायत में कथित रेत उत्खनन, लकड़ी परिवहन, जमीन से जुड़े आरोप, संबंधित डिप्टी की भूमिका, मीडिया में सामने आए वीडियो और अन्य साक्ष्यों की जांच की मांग की गई।
साथ ही पत्रकारों पर लगाए गए पैसे मांगने के आरोपों को भी जांच के दायरे में लाने की मांग की गई है।
संघ ने मांग की है कि—
- – रेत उत्खनन मामले की जांच हो।
- – लकड़ी परिवहन और दस्तावेजों की जांच हो।
- – जंगल की जमीन से जुड़े ₹17 हजार के आरोप की जांच हो।
- – संबंधित डिप्टी की भूमिका और विभागीय रिकॉर्ड की जांच हो।
- – पत्रकारों पर पैसे मांगने के आरोपों की भी साक्ष्य सहित जांच हो।
- – नए निस्तार मामले और ₹6,000 बनाम ₹5,000 की रसीद की जांच हो।
- – जरूरत पड़ने पर स्वतंत्र अथवा बाहरी एजेंसी से जांच कराई जाए।
- – जांच के निष्कर्ष की लिखित जानकारी शिकायतकर्ता को दी जाए।
साथ ही 10 दिन का अल्टीमेटम देते हुए कार्रवाई नहीं होने पर डीएफओ कार्यालय मनेंद्रगढ़ के समक्ष अनिश्चितकालीन धरने की चेतावनी भी दी गई है।
अब नए जिम्मेदार अधिकारी से उम्मीद
सवाल यह है कि क्या नए जिम्मेदार अधिकारी इन सभी मामलों की फाइल एक साथ खोलेंगे?
- क्या रेत वाले मामले की जांच होगी?
- क्या लकड़ी वाले ट्रक के दस्तावेजों की जांच होगी?
- क्या ₹17 हजार वाले आरोप की जांच होगी?
- क्या पत्रकारों पर पैसे मांगने के आरोप का प्रमाण मांगा जाएगा?
- क्या खबरों को झूठा और भ्रामक बताने के दावे की भी जांच होगी?
क्या जरडोल-पतवाही में निस्तार और ₹6,000 बनाम ₹5,000 की रसीद का हिसाब भी सामने आएगा? आरोप किसी पर भी हों—जांच सबकी होनी चाहिए
यह भी साफ है कि किसी अधिकारी पर आरोप लगना अपने आप में दोष सिद्ध होना नहीं है।
लेकिन उसी तरह किसी अधिकारी द्वारा आरोपों को झूठा या भ्रामक बता देना भी अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता।
सच्चाई जांच से सामने आएगी।
अगर अधिकारी निर्दोष हैं तो निष्पक्ष जांच उन्हें क्लीन चिट देगी।
अगर आरोप सही हैं तो दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए। और अगर पत्रकारों पर लगाए गए पैसे मांगने के आरोप सही हैं तो संबंधित पत्रकार पर भी कार्रवाई होनी चाहिए।
लेकिन जांच होनी चाहिए—और निष्पक्ष होनी चाहिए।
कुंवारपुर वन परिक्षेत्र में एक के बाद एक सामने आ रहे मामलों ने अब सिर्फ एक अधिकारी नहीं, बल्कि पूरी विभागीय व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल खड़ा कर दिया है।
- दस्तावेजों की जांच।
- वीडियो की जांच।
- रसीदों की जांच।
- बयानों की जांच।
- आरोपों की जांच।
- और पूरी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक।
क्योंकि अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि “कौन सही और कौन गलत?”
सबसे बड़ा सवाल यह है—
“कुंवारपुर वन परिक्षेत्र में आखिर बार-बार सवाल क्यों उठ रहे हैं?”
और क्या नए जिम्मेदार अधिकारी इस बार सिर्फ सफाई सुनेंगे, या सच सामने लाने के लिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच भी कराएंगे?