एमसीबी/छत्तीसगढ़
भखार न्यूज नेटवर्क | मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी)जिले के कुंवारपुर वन परिक्षेत्र में पदस्थ एक डिप्टी अधिकारी एक बार फिर गंभीर आरोपों को लेकर चर्चा में हैं। उन पर पहले संरक्षित जंगल से कथित अवैध रेत उत्खनन, फिर अवैध लकड़ी परिवहन के मामले में सवाल और अब एक महिला द्वारा जंगल की जमीन दिलाने के नाम पर 17 हजार रुपये लेने का आरोप लगाया गया है।
इन तमाम मामलों के बीच संबंधित अधिकारी का कहना है कि उनके खिलाफ प्रकाशित खबरें “झूठी और भ्रामक” हैं तथा पत्रकारों द्वारा पैसे मांगे जाने का भी आरोप लगाया गया है। हालांकि अब सवाल यह उठ रहा है कि जब तक किसी निष्पक्ष जांच में आरोप गलत साबित नहीं हुए हैं, तब तक बिना जांच के खबरों को झूठा कैसे बताया जा सकता है?
संरक्षित जंगल से रेत उत्खनन पर उठे सवाल

सबसे पहले मामला संरक्षित वन क्षेत्र से कथित अवैध रेत उत्खनन का सामने आया। वीडियो में ट्रैक्टर के माध्यम से रेत निकालते हुए दृश्य दिखाई दे रहा। वहीं ट्रैक्टर मालिक का कथित बयान भी सामने आया, जिसमें उसने कहा कि “डिप्टी साहब ने सुबह रेत निकालने और दिन में वाहन नहीं चलाने की बात कही थी।”
और जब इस मामले में डिप्टी साहब से फोन में बात की है तो उनका कहना था कि पत्रकारों के वीडियो फोटो का कोई महत्व नहीं है
और वीडियो में साफ दिख रहा कि कैसे रेत निकल जा रहा उसके बाद भी डिप्टी साहब का कहना है कि रेत उत्खनन नहीं हो रहा
यदि यह दावा सही है, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि अब तक इस पूरे मामले की विभागीय जांच क्यों नहीं हुई? क्या जिम्मेदार अधिकारियों ने मामले को गंभीरता से लिया? यदि नहीं, तो आखिर क्यों?
लकड़ी से भरी ट्रक का मामला भी सवालों में
20 जून 2026 को कथित रूप से नीलगिरी लकड़ी से भरी एक ट्रक को कुंवारपुर वन परिक्षेत्र में रोका गया था। उस समय संबंधित डिप्टी ने मीडिया के कैमरे के सामने कहा था कि “अभी तक तो अवैध है”, क्योंकि चालक के पास वन विभाग का सत्यापन और वैध दस्तावेज नहीं थे।
सबसे बड़ा सवाल ट्रक चालक द्वारा प्रस्तुत खसरे की फोटोकॉपी में फसल के रूप में यूकेलिप्टस (नीलगिरी) दर्ज था, जबकि उसी खसरा नंबर का ऑनलाइन रिकॉर्ड देखने पर फसल का नाम “निरंक” दिखाई दिया।

यदि यह तथ्य सही हैं, तो सवाल उठता है कि बाद में उस ट्रक को किस आधार पर छोड़ा गया? क्या दस्तावेजों की दोबारा जांच हुई? यदि हुई, तो उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?

महिला का आरोप—जंगल की जमीन के नाम पर 17 हजार रुपये
इसी बीच एक महिला सामने आई, जिसने आरोप लगाया कि उससे जंगल की जमीन दिलाने के नाम पर 17 हजार रुपये लिए गए.?
यह आरोप गंभीर है और इसकी भी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। यदि महिला का आरोप सही है तो जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिए, और यदि आरोप गलत है तो आरोप लगाने वाली महिला के ऊपर कार्यवाही होनी चाहिए.!
पत्रकारों पर पैसे मांगने का आरोप?
संबंधित डिप्टी अधिकारी ने लगातार खबर तिलमिलाए अधिकारी ने यह भी आरोप लगाया है कि पैसे की भी मांग की गई
यदि यह आरोप सत्य है तो संबंधित पत्रकार का नाम, प्रमाण और साक्ष्य सार्वजनिक किए जाने चाहिए, ताकि निष्पक्ष जांच के बाद दोषी पाए जाने पर उसके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई हो सके।
लेकिन यदि बिना किसी प्रमाण के पत्रकारों पर आरोप लगाए गए हैं, तो ऐसे आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यदि वे निराधार साबित हों तो झूठा आरोप लगाने वालों पर भी नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल
- संरक्षित जंगल से हो रहे अवैध रेत उत्खनन पर आखिर जिम्मेदार अधिकारी ने क्यों अनदेखा किया
- जबकि वीडियो में साफ दिखाई दे रहा कि कैसे रेत निकाला जा रहा.!,उसके बाद भी डिप्टी साहब कह रहे कि यह झूठ है..?
- वीडियो और सामने आए तथ्यों की विभागीय जांच क्यों नहीं हुई?
- यदि लकड़ी परिवहन पहले “अवैध” बताया गया था, तो बाद में वाहन किस आधार पर छोड़ा गया?
- और अगर वैध था तो संबंधित डिप्टी के द्वारा क्यों कहा गया कि अभी तक तो अवैध है..?
- खसरे के रिकॉर्ड में कथित अंतर की जांच किस स्तर पर हुई?
- महिला द्वारा लगाए गए 17 हजार रुपये लेने के आरोप की जांच कब होगी?
- पत्रकारों पर लगाए गए आरोपों के समर्थन में क्या कोई प्रमाण मौजूद है?
जनता निष्पक्ष जांच चाहती है
जनहित से जुड़े मामलों में केवल आरोप या खंडन पर्याप्त नहीं होते। सच्चाई निष्पक्ष जांच, दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर ही सामने आती है।,यदि अधिकारी सही हैं, तो जांच उन्हें क्लीन चिट देगी। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
जनता की मांग केवल इतनी है कि सभी आरोपों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जाए तथा जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, ताकि सच सामने आ सके और किसी भी पक्ष के साथ अन्याय न हो।
