जनकपुर/एमसीबी
भखार न्यूज नेटवर्क: मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) जिले के कुंवारपुर वन परिक्षेत्र में पदस्थ एक डिप्टी अधिकारी लगातार गंभीर आरोपों और विवादों के चलते सवालों के घेरे में हैं। कथित अवैध रेत उत्खनन से लेकर लकड़ी परिवहन, वन क्षेत्र की जमीन से जुड़े आरोप और अब पत्रकारों पर पैसे मांगने के आरोप—एक के बाद एक सामने आ रहे मामलों ने न सिर्फ संबंधित डिप्टी की कार्यप्रणाली, बल्कि पूरे वन विभाग की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

सबसे अहम बात यह है कि संबंधित डिप्टी अधिकारी ने केवल कथित अवैध रेत उत्खनन के आरोपों से ही इनकार नहीं किया, बल्कि उनके खिलाफ सामने आए तमाम आरोपों को झूठा, निराधार और भ्रामक बताया है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब इन आरोपों की निष्पक्ष जांच ही नहीं हुई, तो उन्हें निराधार बताने का आधार आखिर क्या है?
आरोप सही हैं या गलत, यह किसी अधिकारी के बयान से नहीं बल्कि निष्पक्ष जांच, दस्तावेजों, वीडियो और साक्ष्यों से तय होना चाहिए।
जांच से पहले आरोप निराधार कैसे?
यदि किसी अधिकारी के खिलाफ अवैध रेत उत्खनन, लकड़ी परिवहन में अनियमितता, वन क्षेत्र की जमीन से जुड़े आरोप और अन्य गंभीर शिकायतें सामने आती हैं, तो सबसे पहले उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
जांच में मौके की स्थिति, वीडियो, दस्तावेज, संबंधित लोगों के बयान और अन्य साक्ष्यों की पड़ताल के बाद ही यह स्पष्ट हो सकता है कि आरोप सही हैं या निराधार।
लेकिन सवाल यह है कि बिना जांच के ही सभी आरोपों को निराधार कैसे बता दिया गया?
यदि डिप्टी अधिकारी के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप गलत हैं, तो निष्पक्ष जांच के बाद उन्हें क्लीन चिट मिलनी चाहिए और जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए। वहीं यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
इसलिए फिलहाल सवाल यह नहीं कि आरोप सही हैं या गलत—सवाल यह है कि पहले निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होती?
डिप्टी का दावा—अवैध रेत उत्खनन नहीं, लेकिन वीडियो में क्या दिखा?
कुंवारपुर वन परिक्षेत्र में कथित अवैध रेत उत्खनन को लेकर जब लगातार सवाल उठे तो संबंधित डिप्टी अधिकारी ने अपने क्षेत्र में किसी भी प्रकार के अवैध रेत उत्खनन से इनकार किया।
लेकिन इसके बाद सामने आए वीडियो ने पूरे मामले को फिर सवालों के घेरे में ला खड़ा किया। वीडियो में ट्रैक्टर के माध्यम से रेत का उत्खनन और परिवहन होता दिखाई दे रहा है।
ऐसे में सवाल यह है कि यदि क्षेत्र में अवैध रेत उत्खनन नहीं हो रहा था, तो वीडियो में दिखाई दे रही गतिविधि आखिर क्या थी?
मामले को और गंभीर बनाने वाला एक कथित बयान भी सामने आया है। मौके पर मीडिया टीम की मौजूदगी में ट्रैक्टर मालिक ने फोन पर बातचीत के दौरान कथित तौर पर डिप्टी अधिकारी का नाम लेते हुए कहा कि डिप्टी साहब ने सुबह रेत निकालने और दिन में ट्रैक्टर नहीं चलाने की बात कही थी।
हालांकि इस बयान की स्वतंत्र पुष्टि जांच का विषय है। यही वजह है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी हो जाती है।
शिकायत के दौरान डिप्टी के कथित बयान ने भी खड़े किए सवाल
मामले की शिकायत और जानकारी लेने के लिए जब मीडिया द्वारा संबंधित डिप्टी अधिकारी से फोन पर संपर्क किया गया तो कथित तौर पर उन्होंने पत्रकारों के वीडियो और फोटो को महत्वहीन बताया।
कथित बातचीत में यह भी कहा गया कि ट्रैक्टर पकड़कर लाया जाए, उसके बाद विभाग कार्रवाई करेगा।
जब मौके पर डिप्टी अधिकारी को बुलाने की बात कही गई तो कथित तौर पर उन्होंने कहा कि वे मौके पर मौजूद ही नहीं हैं।
अब सवाल यह है कि यदि विभागीय अधिकारी को अपने क्षेत्र में अवैध उत्खनन की जानकारी नहीं थी, तो मौके पर मौजूद गतिविधियों की जांच किस स्तर पर हुई?
एक के बाद एक आरोप, लेकिन कार्रवाई पर अब भी सवाल
कुंवारपुर वन परिक्षेत्र के संबंधित डिप्टी पर इससे पहले भी कई गंभीर आरोप सामने आते रहे हैं। कथित अवैध रेत उत्खनन के बाद लकड़ी परिवहन को लेकर सवाल उठे और अब जंगल की जमीन दिलाने के नाम पर पैसे लेने का आरोप भी सामने आया है।
एक महिला ने आरोप लगाया है कि जंगल की जमीन दिलाने के नाम पर उससे 17 हजार रुपये लिए गए।
यह आरोप गंभीर है। यदि आरोप सही है तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन यदि आरोप गलत है तो शिकायतकर्ता के खिलाफ भी नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
लेकिन दोनों ही परिस्थितियों में पहले निष्पक्ष जांच जरूरी है।
लकड़ी से भरे ट्रक का मामला भी सवालों में
20 जून 2026 को कथित रूप से नीलगिरी की लकड़ी से भरे एक ट्रक को कुंवारपुर वन परिक्षेत्र में रोके जाने का मामला भी सामने आया था।
उस दौरान संबंधित डिप्टी अधिकारी ने मीडिया कैमरे के सामने कथित तौर पर कहा था कि दस्तावेजों के आधार पर वाहन “अभी तक तो अवैध है”, क्योंकि चालक के पास वन विभाग का सत्यापन और वैध दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे।
इसके बाद ट्रक चालक द्वारा प्रस्तुत खसरे की फोटोकॉपी में फसल के रूप में यूकेलिप्टस दर्ज होने की बात सामने आई, जबकि उसी खसरा नंबर के ऑनलाइन रिकॉर्ड में फसल का नाम कथित तौर पर “निरंक” दिखाई दिया।
यदि रिकॉर्ड में ऐसा अंतर था तो सवाल यह है कि बाद में वाहन किस आधार पर छोड़ा गया? क्या दस्तावेजों की दोबारा जांच की गई? यदि जांच की गई तो उसकी रिपोर्ट और रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए?
खबरों से तिलमिलाए डिप्टी ने पत्रकारों पर लगाया पैसे मांगने का आरोप
लगातार प्रकाशित खबरों के बीच संबंधित डिप्टी अधिकारी ने पत्रकारों पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं।
डिप्टी का कथित आरोप है कि एक स्थानीय न्यूज पोर्टल उनके खिलाफ बिना सबूत खबरें प्रकाशित कर रहा है, जिससे उनकी छवि खराब हो रही है और उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। इसके अलावा उन्होंने पत्रकारों द्वारा पैसे मांगने का भी आरोप लगाया है।
यदि वास्तव में किसी पत्रकार ने पैसे की मांग की है तो संबंधित डिप्टी अधिकारी को पत्रकार का नाम, प्रमाण और साक्ष्य सार्वजनिक करना चाहिए, ताकि निष्पक्ष जांच हो और दोषी पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जा सके।
लेकिन यदि पत्रकारों पर लगाया गया पैसे मांगने का आरोप जांच में निराधार साबित होता है, तो बिना प्रमाण गंभीर आरोप लगाने के मामले में संबंधित डिप्टी की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है और नियमानुसार कार्रवाई की मांग उठ सकती है।
सवाल सिर्फ डिप्टी पर नहीं, जिले के जिम्मेदार अधिकारियों पर भी
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने गंभीर और लगातार सामने आ रहे आरोपों के बावजूद जिले के जिम्मेदार अधिकारी आखिर कर क्या रहे हैं?
- यदि डिप्टी के खिलाफ सामने आए आरोप झूठे और निराधार हैं, तो विभाग निष्पक्ष जांच कराकर उन्हें क्लीन चिट क्यों नहीं देता?
- यदि आरोप सही हैं तो अब तक स्पष्ट कार्रवाई क्यों नहीं दिखाई दे रही?
- वीडियो सामने आने के बाद भी कथित अवैध रेत उत्खनन के मामले में निष्पक्ष जांच क्यों नहीं हुई?
- लकड़ी परिवहन के मामले में दस्तावेजों और खसरा रिकॉर्ड के कथित अंतर की जांच किस स्तर पर हुई?
- 17 हजार रुपये लेने के महिला के आरोप की जांच कब होगी?
- और सबसे महत्वपूर्ण—पत्रकारों पर पैसे मांगने के आरोप के समर्थन में डिप्टी के पास क्या प्रमाण हैं?
क्या जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ तमाशा देख रहे हैं?
लगातार आरोप सामने आने के बावजूद यदि विभागीय स्तर पर कोई स्पष्ट और सार्वजनिक जांच सामने नहीं आती है, तो इससे सिर्फ संबंधित डिप्टी ही नहीं बल्कि जिले के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
किसी अधिकारी के खिलाफ आरोप लगना अपने आप में दोष सिद्ध होना नहीं है। लेकिन आरोपों की जांच किए बिना उन्हें निराधार घोषित कर देना भी सवालों से परे नहीं हो सकता।
जांच ही वह माध्यम है जो तय करेगी कि आरोपों में कितना तथ्य है और कितना नहीं।
यदि डिप्टी अधिकारी सही हैं तो निष्पक्ष जांच उनके पक्ष में जाएगी। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जांच के बाद कार्रवाई का रास्ता साफ होना चाहिए।
लेकिन जांच के बजाय यदि सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप चलते रहें तो इससे व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठते रहेंगे।
निष्पक्ष जांच और सार्वजनिक रिपोर्ट
इस पूरे मामले में सबसे जरूरी है कि विभागीय या प्रशासनिक स्तर पर निष्पक्ष जांच कराई जाए।
कथित अवैध रेत उत्खनन के वीडियो की सत्यता, ट्रैक्टर मालिक के कथित बयान, डिप्टी और संबंधित लोगों के बीच हुई बातचीत, लकड़ी से भरे ट्रक के दस्तावेज, खसरा रिकॉर्ड, महिला द्वारा लगाए गए 17 हजार रुपये के आरोप और पत्रकारों पर लगाए गए पैसे मांगने के आरोप—इन सभी बिंदुओं की स्वतंत्र रूप से जांच होनी चाहिए।
जांच में जो भी दोषी मिले, उसके खिलाफ कार्रवाई हो और जो निर्दोष हो, उसे भी स्पष्ट रूप से क्लीन चिट दी जाए।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक डिप्टी का नहीं है।
सवाल यह है कि कुंवारपुर वन परिक्षेत्र में आखिर व्यवस्था चल किसके भरोसे रही है?
और सबसे बड़ा सवाल—
गंभीर आरोपों, सामने आए वीडियो और लगातार उठ रहे सवालों के बावजूद जिले के जिम्मेदार अधिकारी कब तक चुप्पी साधे रहेंगे?
